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कोई भी कला तबतक जीवित नहीं रह सकती जबतक उसे जीविका से ना जोड़ा जाए। पर यह इतना आसान भी नहीं है। मिलते हैं आज मुनमुन देवी से जिनकी ज़िद इस कला को मुक़ाम तक ले जाएगी। घरेलू काम से इतर जो भी समय इनके पास होता है वो पूरा समय मंजूषा कला को देती हैं। दिन में 8 घंटे से अधिक समय मंजूषा क्राफ़्ट को बनाने में देती हैं। Ulupi Jha के नेतृत्व में सैकड़ों ऐसी महिलाएँ मिलकर एक नया अध्याय लिख रही हैं। आपको इसकी एक झलक आज से भागलपुर में शुरू हो रहे 7 दिवसीय मंजूषा महोसव में देखने को मिलेगी।

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